सौरमण्डल में सबसे सुन्दर नील वलय वाले ग्रह हैं शनि, पर उनकी दशा आ रही है सुनते ही डर लगने लगता है। हमारे पूर्णावतार नील वर्ण से प्रतिष्ठा पाए हुए हैं पर शनिदेव के बारे में जनसाधारण की धारणाएं कुछ अलग ही हैं। ‘यार मेरे हाथ में तो शनि बैठा हुआ है’, ‘शनि की साढ़ेसाती जब से लगी है, तब से कष्ट में ही चल रहा हूं’, ‘अभी तो शनि की दशा बाकी है’ इन जुमलों को प्राय: हम सुनते रहते हैं। और अगर साढ़ेसाती निकलने के बाद किसी को यह मालूम चले कि अभी उसकी 19 वर्ष की शनि महादशा आई है तो व्यक्ति की जान सी ही निकल जाती है।
विंशोत्तरी दशा पद्धति में 120 वर्ष की दशा अवधि में शनिदेव को 19 वर्ष प्रदान किए गए हैं। ज्योतिष में इन्हें दण्डनायक कहा जाता है। ये कर्मों का फल प्रदान करते हैं और अच्छे-बुरे कर्मों के फलों का दिग्दर्शन कराते हैं। इनकी दशावधि में व्यक्ति साधारण नहीं रहता, उत्थान या पतन देखने को मिलता है।
खगोल शास्त्र के दृष्टिकोण से शनिदेव बहुत सुन्दर हैं। इनके तीन वलय अत्यन्त आकर्षक हैं और सम्मोहन पैदा करते हैं। ये बृहस्पति देव से थोड़े ही छोटे हैं परन्तु इनकी कक्षा बृहस्पति की कक्षा के बाद ही आती है। इनके भी अनेक चन्द्रमा हैं। सौरमण्डल के प्रभावी ग्रहों में से एक शनि को भारतीय ज्योतिष में सूर्य से आखिरी कक्षा में माना गया था परन्तु जैसे ही हर्षल, प्लूटो और नेपच्यून की बात चली तो उन्हें Extra Saturnine Planets कहा जाने लगा। इसका शाब्दिक अर्थ है कि शनि की कक्षा से बाहर पडऩे वाले ग्रह।
शनि को ज्योतिष में क्रूर ग्रह माना गया है। पुष्य, अनुराधा और उत्तरा भाद्रपद इनसे संबंधित नक्षत्र माने गए हैं। शनि को दु:ख स्वरूप माना गया है और इन्हें कृष्ण वर्ण माना गया है। शनि के प्रत्यधि देव ब्रह्मा हैं और इन्हें नपुंसक माना गया है। ये वायु-तत्व हैं। इन्हें शूद्र वर्ण का माना गया है और ज्योतिष में तमोगुणी भी माना गया है। लम्बी और दुबली देह, पिंगल नेत्र, स्थूल दन्त, आलसी, पंगु और कठोर रोम वाला शनि है। इनका रस कसैला है। अयन, मुहूर्त, अहोरात्र, ऋतु, मास, पक्ष और वर्ष इनमें से वर्ष के स्वामी शनि हैं। ये पश्चिम दिशा में बलवान होते हैं, रात्रि में बलवान होते हैं। कृष्ण पक्ष में भी ये बली रहते हैं और दक्षिण अयन में इन्हें अधिक शक्ति प्राप्त होती है।
नीरस वृक्षों को शनि उत्पन्न करते हैं। शनि का स्थान वह है, जहां दीमक रहती है। चित्रित वस्त्र और पाट के वस्त्र शनि के माने जाते हैं। ये धातुओं के स्वामी हैं और इन्हें वृद्ध माना जाता है। इन्हें आयु प्रदान करने वाला ग्रह माना जाता है। शनि तुला में उच्च राशि के होते हैं तथा 20 अंश पर परमोच्च कहलाते हैं। बुध और शुक्र इनके मित्र, गुरु सम और सूर्य, चन्द्र, मंगल इनके शत्रु समझे जाते हैं। शनि के आधार पर गुलिक की गणना की जाती है। यह गणितीय बिन्दु हैं और कई बार इन्हें मान्दि या शनि पुत्र भी कहा जाता है। दक्षिण भारत में गुलिक से भविष्य कथन पर ध्यान दिया जाता है और वहां गुलिक का मंदिर भी है।
शनि मकर और कुंभ राशियों के स्वामी हैं। इनमें से मकर वात प्रकृति और कुंभ त्रिधातु प्रकृति की है। मकर राशि को तमोगुणी, भूमितत्व, दक्षिणवासी, रात्रिबली, पृष्ठोदय, दीर्घ शरीर, वन और भूमि में भ्रमण करने वाली माना गया है तो कुंभ को घड़ा लिए हुए पुरुष, भूरा वर्ण, मध्य देह, द्विपद, दिनबली, जलचारी परन्तु वायुतत्व, शीर्षोदय, तमोगुणी, शूद्र जाति और पश्चिम दिशा में बली माना गया है।
मकर लग्न में जलबंध अर्थात् बांध या पुल निर्माण, मोक्ष संबंधी कार्य, अस्त्र निर्माण, कृषि, ऊंट संबंधी कार्य, प्रस्थान, पशुकर्म तथा दास आदि संबंधित कर्म करना लाभदायक होता है। कुंभ लग्न में कृषि, व्यापार, पशु, जल, शिल्पकला, जलयात्रा तथा अस्त्र-शस्त्रादि का काम करना शुभ होता है। शनि की उच्च राशि तुला में कृषि, वाणिज्य, सवारी, घोड़े का काम, पशुकर्म, विवाह, व्रत इत्यादि के कार्य, तौलने संबंधी कार्य तथा बर्तनों से संबंधित कार्य करना चाहिए।
जिस भाव में शनि हों और जिस भाव में गुलिक हों इन दोनों के अंतर से तथा लग्न और नवम भाव के अंतर से एक गणना की जाती है, जिससे गर्भाधान का समय निकाला जाता है। जुड़वां बच्चों के भविष्यकथन में इस आधान लग्न का प्रयोग किया जाता है।
शनि महादशा में राहु, गुरु, बुध, शुक्र तथा इन सबसे पहले स्वयं शनि की अन्तर्दशा बहुत लम्बे समय तक चलती है। शनि की पूर्ण दृष्टियों में तीसरी, सातवीं और दसवीं विशेष प्रसिद्ध हंै।
शनि के जो नक्षत्र हैं उनमें पुष्य नक्षत्र सबसे शक्तिशाली माने गए हैं और उन्हें नक्षत्रराज की संज्ञा दी गई है। जो व्यक्ति पुष्य नक्षत्र में जन्म लेता है वह पंडित, ऐश्वर्यवान, पराक्रमी, दयालु, धार्मिक, धनी, कलाकार, सत्यवादी और सरल स्वभाव का होता है। पुष्य नक्षत्र को मुहूर्त शास्त्र में अत्यधिक प्रतिष्ठा दी गई है परन्तु पुष्य नक्षत्र को विवाह के लिए वर्जित किया गया है।
अनुराधा नक्षत्र, वृश्चिक राशि में पड़ता है। यद्यपि वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल शनि के मित्र नहीं हैं परन्तु उस राशि में भी यदि शनि हों तो और अनुराधा नक्षत्र में हों तो स्वयं का नक्षत्र होने के कारण शनि शुभफल दे सकते हैं। यदि जन्म के समय चन्द्रमा अनुराधा नक्षत्र में हों तो वह व्यक्ति राजकार्य के निपुण, परदेश में वास करने वाला, स्त्रियों से आकर्षित, सुन्दर, छिपकर कार्य करने वाला तथा पिंगल वर्ण का होता है।
शनि का तीसरा नक्षत्र उत्तरा भाद्रपद है। यदि जन्म के समय चन्द्रमा उत्तरा भाद्रपद में हों तो निश्चित संतान होती है, व्यक्ति धार्मिक वक्ता, शत्रुहंता, सुखी, समर्थ, दृढ़निश्चय वाला तथा कामी होता है।
उपरोक्त नक्षत्रों में जो लोग जन्म लेते हैं उनको जन्म के समय शनि महादशा होती है। नक्षत्र का आनुपातिक दृष्टि से जितना भाग बीत गया हो, उसको भुक्त शनि दशा कहते हैं और जितना भाग बच गया हो उसको भोग्य शनि दशा कहते हैं। इस क्रम में नक्षत्र के बीच में जन्म लेने से कुछ अन्तर्दशाएं बीत चुकी होती हैं।
विन्ध्याचल और गोदावरी के मध्य का भाग शनि का क्षेत्र माना गया है, परन्तु जो लोग पूरे संसार को भविष्य कथन बताना चाहते हैं उन्हें शनि के अन्य देश भी खोजने पड़ेंगे अत: यह भविष्य कथन सामान्य-सा परिवर्तित हो जाएगा।
अब हम इनके फलाफल का निरूपण करते हैं- शनि अत्यन्त महत्वाकांक्षी हैं, हर तथ्य को अपने नियंत्रण में ले लेना चाहते हैं, अनंत विस्तार की इनकी इच्छा बनी रहती है। यदि शनि शक्तिशाली हंै तो वह व्यक्ति के मकान का विस्तार चाहते हैं, व्यापार, व्यवसाय का विस्तार चाहते हैं, कई बार अतिक्रमण की हद तक चले जाते हैं और यह सब नहीं हो तो उनके प्रभाव क्षेत्र का विस्तार चाहते हैं। किसी व्यक्ति को अगर शनि की कृपा मिल जाए तो उस व्यक्ति से वरिष्ठ व्यक्ति का चाहे नुकसान ही हो जाए परन्तु शनि से प्रभावित व्यक्ति को लाभ मिलता है। उदाहरण के लिए डिप्टी मैनेजर को यदि प्रमोशन देना है तो शनिदेव मैनेजर को या तो हटा देंगे या उन्हें कोई नुकसान पहुंचा देंगे और उन्हें प्रमोशन देकर भी अन्य स्थान पर भेजा जा सकता है। इसका सकल उद्देश्य डिप्टी मैनेजर को उन्नति देना है। एक तरफ शनि विनाश कर देते हैं, यदि वो नाराज हों और यदि वे प्रसन्न हों तो अनन्त सफलता और सिद्धि देते हैं। वृषभ लग्न और तुला लग्न वालों को शनि योगकारक होते हैं और यदि अस्त व वक्री न हों तो अनन्त लाभ देते हैं। किसी परिस्थिति में वक्री शनि भी बहुत अधिक लाभ देते हैं परन्तु यदि शनि द्वितीयेश या सप्तमेश हों तो अपमृत्यु दे सकते हैं। इनके समाधान के लिए पाराशरजी विष्णु सहस्त्र नाम का जप, गोदान और महिषदान (भैंसा) बताते हैं। शनि का मंत्र पाठ और शनि के वर्गों को दानशनि को प्रसन्न करते हैं।
शनि की विभिन्न अन्तर्दशाओं के फल
शनि के शुभ होने पर विभिन्न अन्तर्दशाओं के फल लिखे जा रहे हैं। अशुभ होने पर उनसे उलट परिणाम मिलेंगे।
बुध- यज्ञ में प्रवृत्ति, राजयोग, देहसुख, उत्साह, घर में कल्याण, तीर्थ स्नान, वाणिज्य से लाभ, धर्मानुष्ठान, पुराण श्रवण, अन्नदान, धर्म कार्य और मधुर भोजन।
केतु- स्थान हानि, भय, दरिद्रता, कष्ट, विदेश यात्रा। अन्तर्दशा के प्रारंभ में सुख और धनलाभ, गंगा आदि का स्नान और देवता दर्शन हो सकता है, यदि केतु का लग्नेश से संबंध हो।
शुक्र- स्त्री पुत्र प्राप्ति, धन, आरोग्य, घर में कल्याण, राज्य लाभ, राजा की कृपा से सुख सम्मान, वस्त्र भूषण आदि, वाहन आदि अभीष्ट वस्तु का लाभ। ये भाग्योदय देते हैं, सम्पत्ति बढ़ाते हैं और योग से प्राप्ति होती है।
सूर्य- मालिक से सुख, घर में कल्याण, पुत्रादि सुख, वाहन और पशु का लाभ।
चन्द्रमा- वाहन, वस्त्र और भूषण का लाभ, सुख, सौभाग्य की वृद्धि, नौकरों की वृद्धि, माता-पिता से सुख और पशु वृद्धि।
मंगल- धनलाभ, शासन से लाभ, वाहन, वस्त्र और भूषण का लाभ, नेतृत्व, खेती और पशुओं की वृद्धि, नवीन गृह निर्माण और बंधुओं को सुख।
राहु- कलह, मानसिक कष्ट, शारीरिक कष्ट, संताप, पुत्रों से द्वेष, रोग-भय, व्यर्थ का खर्च, राजभय, स्वजनों से विरोध, विदेश यात्रा, घर और खेती में हानि।
गुरु- सब कार्यों की सिद्धि, घर में कल्याण, शासन की कृपा, धन, वाहन, भूषण, वस्त्र लाभ, सम्मान, देव और गुरुओं में भक्ति, विद्वानों का संग और स्त्री, पुत्र इत्यादि से सुख।